बंगाल में भाजपा के बढ़ते प्रभाव से घबराई ममता तानाशाही पर उतर आई हैं !

ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में संघ व भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता से भयभीत हैं। प्रदेश में भाजपा  कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को कमजोर करती जा रही है। जमीनी स्तर पर यहां बड़ा बदलाव हो रहा है। ममता बनर्जी इसे महसूस कर रही हैं। अब भाजपा की आंधी में ममता को अपना किला उड़ने  का भय सताने लगा है, बस इसी कारण वो तरह-तरह से भाजपा-संघ के विरोध में लगी हैं। वह सम्भावित परिवर्तन को रोकने के लिए नकारात्मक कदम उठा रही हैं। यहाँ तक कि अब वो बंगाल में संघ और भाजपा के कार्यक्रमों को रोकने जैसे तानाशाही रवैये पर उतर आई हैं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वोटबैंक सियासत में इतना उलझ गई हैं कि अब उन्हें राष्ट्रवादी विचारो से परेशानी होने लगी है। वस्तुतः इसे वह अपने लिए सबसे बड़ी चुनौती मानने लगी हैं। यही कारण है कि उनकी सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के कार्यक्रम हेतु महाजाति आडिटोरियम की बुकिंग रदद् करा दी। यह राज्य सरकार का आडिटोरियम है। बताया जाता है कि संबंधित अधिकारियों ने ऊपर के दबाब में यह फैसला लिया है। तीन अक्टूबर को प्रस्तावित इस कार्यक्रम में प्रदेश के राज्यपाल को भी शामिल होना था। स्पष्ट है कि ममता बनर्जी सरकार ने संवैधानिक मर्यादा का भी ध्यान नही रखा।

केशरी नाथ त्रिपाठी सरकार के संवैधानिक प्रमुख है। यह सरकार का दायित्व था कि ऑडिटोरियम में यदि कोई कमी थी, तो उसे दूर करती। इसके लिए समय भी था। इतना ही नही प्रदेश सरकार ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के कार्यक्रम हेतु कोलकाता के नेता जी सुभाष स्टेडियम को देने से इनकार कर दिया है।

इन सब बातों से स्पष्ट रूप से जाहिर है कि ममता बनर्जी एकदम खुलकर अभिव्यक्ति की आजादी में बाधा खड़ी कर रही हैं। भारत का संविधान उसके नागरिकों देश के किसी भी राज्य में आने-जाने, रहने और बोलने की आजादी देता है, मगर ममता अपने राजनीतिक विरोध के अन्धोत्साह में इस संवैधानिक मर्यादा को भी तार-तार कर रही हैं।

दरअसल  वह संघ व भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता से भयभीत हैं। प्रदेश में भाजपा  कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को कमजोर करती जा रही है। जमीनी स्तर पर यहां बड़ा बदलाव हो रहा है। ममता बनर्जी इसे महसूस कर रही हैं। अब भाजपा की आंधी में ममता को अपना किला उड़ने  का भय सताने लगा है, बस इसी कारण वो तरह-तरह से भाजपा-संघ के विरोध में लगी हैं।

वह सम्भावित परिवर्तन को रोकने के लिए नकारात्मक कदम उठा रही हैं। ममता बनर्जी को समझना चाहिए कि उनकी इस नकारात्मक और अंधविरोधी राजनीति से उन्हें लाभ नहीं, हानि ही होगी। इसके बजाय उचित होगा कि वे बंगाल के शासन-प्रशासन और  बदहाल क़ानून व्यवस्था पर ध्यान दें।