क्या बंगाल में दरकने लगी है तृणमूल की दीवार

उत्तरप्रदेश साहित कई राज्यों में मिली प्रचंड जीत के बाद अप्रैल, 2107 में ओड़िसा में हुई भाजपा की  राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में अमित शाह ने एक बयान दिया था, जो तब सुर्ख़ियों में छाया रहा. उत्तर प्रदेश की प्रचंड जीत के उत्सव में झूम रहे भाजपा कार्यकर्ताओं से शाह ने कहा था कि यह जीत बड़ी है, लेकिन यह भाजपा का स्वर्णकाल नहीं है. भाजपा का स्वर्णकाल तब आयेगा जब भाजपा पश्चिम बंगाल और केरल जैसे राज्यों में सत्ता में आएगी. अमित शाह अगर कुछ बोलते हैं तो उसके पीछे उनकी ठोस रणनीति होती है. अत: भाजपा अध्यक्ष के उस बयान को पश्चिम बंगाल की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों के केंद्र में रखकर समझने की जरूरत है. राजनीतिक विश्लेषक अब कुछ हदतक स्वीकार करने लगे हैं कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में गत एक-डेढ़ वर्ष में सबसे बड़ा परिवर्तन यह आया है कि सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के सामने सर्वाधिक मुखर विपक्ष की भूमिका में भाजपा खुद को स्थापित करने में सफल होती दिख रही है. परिवर्तन की यह आहट पश्चिम बंगाल की राजनीति में किस तरह का बदलाव लाने जा रही है, इसका सटीक आकलन करना अभी थोड़ा कठिन  अवश्य है किन्तु इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा वहां सर्वाधिक मुखर विपक्ष के रूप में सड़क पर संघर्ष करने वाली पार्टी बनती जा रही है.

पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुख्यतया चार दल- तृणमूल कांग्रेस, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, कांग्रेस और भाजपा, प्रभावी कहे जा सकते हैं, जो कुछ साल पहले तक तीन हुआ करते थे. क्योंकि, भाजपा की भूमिका बंगाल में प्रभावी दल के रूप में 2014 के आम चुनाव से पहले नहीं मानी जाती थी. वर्ष 2014 के चुनाव में भाजपा को बंगाल से न सिर्फ दो लोकसभा सीटों पर जीत मिली बल्कि 17 फीसद से ज्यादा वोट हासिल हुए. इसके बावजूद भाजपा को चौथे पायदान की पार्टी ही माना गया. चूँकि तृणमूल कांग्रेस का धुर विरोध कम्युनिस्ट पार्टी से रहा है. दशकों के कम्युनिस्ट शासन को उखाड़कर ही ममता बैनर्जी ने बंगाल की सत्ता पर कब्जा किया, लिहाजा उनके प्रथम राजनीतिक विरोधी कम्युनिस्ट बने रहे. बंगाल की राजनीति में कांग्रेस लंबे समय से सत्ता से बाहर थी और तृणमूल कांग्रेस के उभार के बाद तो तीसरे पायदान पर खिसक गयी थी. इसके पीछे मूल वजह कांग्रेस की अवसरवादी और अस्थिर राजनीति रही. अगर देखा जाए तो गठबंधन की सियासत में कांग्रेस कभी तृणमूल तो कभी वाम के साथ खड़ी नजर आई. उदाहरण के तौर पर देखें तो 2011 के बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस यूपीए का हिस्सा थी, लिहाजा वह चुनाव कांग्रेस के साथ गठबंधन में लड़ी और जीत हासिल की. इसके बाद 2014 में जब युपीए की सरकार गई और 2016 में बंगाल विधानसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस कम्युनिस्ट पार्टी के साथ खड़ी नजर आई. हालांकि इन चुनावों में कम्युनिस्ट-कांग्रेस गठबंधन को हार का सामना करना पड़ा. कांग्रेस की ‘कभी वाम तो कभी तृणमूल’ की इस नीति  ने बंगाल में उसकी विश्वसनीयता और जनाधार को और कम कर दिया. यह सब बंगाल में तब हो रहा था जब भाजपा धीरे-धीरे प्रदेश में अपने सांगठनिक क्षमता को मजबूत करने में लगी थी.

वर्ष 2014 में जब केंद्र की सत्ता नरेंद्र मोदी के हाथ आई और संगठन की बागडोर अमित शाह ने सम्हाली, बंगाल को लेकर भाजपा की कार्यपद्धति में बदलाव की बुनियाद उसी दौरान पड़ने लगी. आम चुनावों भाजपा को लगभग 87 लाख मतदाताओं ने वोट दिया था. जबकि वहां भाजपा के सदस्यों की संख्या महज डेढ़-दो लाख के आसपास थी. अमित शाह एक कुशल रणनीतिकार माने जाते है, लिहाजा उन्हें समझने में देर न लगी कि बंगाल की सियासी जमीन के भीतर वहां के सत्ताधारी दल के खिलाफ कुछ उथल-पुथल चल रही है, जिसे भाजपा के पक्ष में मोड़ने की जरूरत है. शाह को शायद इसबात का अनुमान रहा होगा कि वहां सत्ताधारी दल इसलिए राजनीतिक रूप से मजबूत है क्योंकि वहां की जनता लंबे कम्युनिस्ट शासन से तंग आ चुकी है और जनता की नजर में कांग्रेस की छवि ‘न इधर के न, उधर के’ वाली बन चुकी है. लिहाजा, शाह ने सदस्यता के स्तर पर, संपर्क के स्तर पर एवं संगठन के स्तर पर बंगाल में भाजपा को मजबूती दिलाने का काम शुरू कर दिया. चूँकि बंगाल में चौथे पायदान की पार्टी मानी जाने वाली भाजपा के लिए पहला महत्वपूर्ण कार्य था, संघर्ष और राजनीतिक आन्दोलन  के माध्यम से बंगाल की राजनीति में पैदा हुए विपक्ष की ‘शून्यता’ की जगह पर कब्जा करना. इसकी शुरुआत अमित शाह ने 25 अप्रैल 2017 को नक्सलबाड़ी से कर दी थी. अपने बूथ प्रवास के दौरान शाह तीन दिनों तक बंगाल में रहे और नक्सलबाड़ी से उन्होंने बूथ संपर्क शुरू किया. इस प्रवास में उन्होंने संगठन के पदाधिकारी, कार्यकर्ता, बूथ विस्तारक, बंगाल के पत्रकार, प्रबुद्ध वर्ग साहित अनेक लोगों से संपर्क किया. शाह के उस प्रवास को अब लगभग डेढ़ साल होने को हैं. इन डेढ़ वर्षों में बंगाल की जमीन पर भाजपा की स्थिति प्रमुख विपक्षी दल के रूप में नजर आने लगी है. हाल ही में हुए पंचायत के चुनावों में जिस ढंग से पश्चिम बंगाल की सरकार ने चुनाव को प्रभावित करने और हिंसा को बढ़ावा देने जैसा कार्य किया, उससे यह इस धारणा को और बल मिला कि बंगाल में भाजपा के बढ़ते प्रसार और प्रभाव ने ममता की चिंता बढ़ा दी है.

बंगाल में हुए हाल के इन चुनावों में जिस ढंग से सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस ने धन, बल और हिंसा के सहारे विरोधी दलों की चुनाव में हिस्सा लेने से रोकने की कोशिश की, उससे यह साफ़ पता चलता है कि ममता बैनर्जी भी यह स्वीकार कर चुकी हैं कि अब उनकी लड़ाई भाजपा से है. यह एक ऐसा चुनाव था, जिसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी आश्चर्य व्यक्त किया था. इन सबके बावजूद जब चुनाव परिणाम आये तो भारतीय जनता पार्टी बंगाल में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. भाजपा ने कम्युनिस्ट पार्टी को तीसरे पायदान पर धकेल दिया. इसी साल फरवरी में नोयापाड़ा विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव, जो कांग्रेस की जीती सीट थी, के परिणामों ने भाजपा के बढ़ते जनाधार को साबित किया. इस सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा दूसरे नंबर की पार्टी बनी जबकि कांग्रेस चौथे पायदान पर खिसक गयी. हाल में हुए इन चुनाव इन परिणामों ने ममता की मुश्किलें तो बढाई ही, साथ ही चुनावी पंडितों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या त्रिपुरा की तरह बंगाल का तृणमूल दुर्ग भी ध्वस्त होने जा रहा है ?

अब लोकसभा चुनाव में कुछ महीने ही बचे हैं. इन सबके बीच भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह लगातार यह बोलते नजर आ रहे हैं कि 2019 में बंगाल से भाजपा को 22 से ज्यादा सीटों पर जीत मिलने जा रही है. शाह के दावे में कितनी सच्चाई है यह तो परिणामों से ही सटीक पता चलेगा, लेकिन उनकी कार्यशैली पर संदेह नहीं किया जा सकता है. अगर शाह ने 22 सीटों का लक्ष्य रखा है तो इसकी रणनीति भी पुख्ता तैयार किये होंगे. गत डेढ़ महीने में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दो बार बंगाल का दौरा कर चुके हैं. एक इंटरव्यू में तो वे यहाँ तक कह चुके हैं कि वे महीने के तीन दिन बंगाल में रहने का मन बना रहे हैं. अत: लक्ष्यभेदी रणनीतिकार अमित शाह की नजरें यदि बंगाल में ममता के दुर्ग पर हैं तो यह राजनीतिक लड़ाई और रोचक होने वाली है. मुद्दों की समझ रखने वाले, जनता की नब्ज को टटोलने और बिना देर किये सटीक निर्णय करने वाले अमित शाह का बंगाल पर फोकस और ममता बनर्जी की बौखलाहट इस बात का संकेत है कि बंगाल में तृणमूल की सियासी दीवार की नींव दरकने लगी है. उन्हें इस बात का भय है कि कहीं ‘बंगाल का त्रिपुरा; न हो जाए!

लेखक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च फेलो हैं.